What is mind? How to control it? मन क्या है? मन को वश में कैसे करें ?

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What is mind ?मन क्या है?

श्री कृष्ण कहते हैं:- प्राणी के शरीर का एक अदृश्य अंग है मन जो दिखाई नहीं देता। परंतु वही सबसे शक्तिशाली हिस्सा है
शरीर का। ये याद रखो कि मन शरीर का हिस्सा है। उसका आत्मा से कोई संबंध नहीं है।
(An invisible part of the creature’s body is the mind that is not visible. But that’s the most powerful part Of the body. Remember that the mind is part of the body. It has no connection with the soul.)
आत्मा यदि रथ में बैठा हुआ रथ का स्वामी है तो मन शरीर रूपी रथ का सारथी है। ये मन ही इंद्रियों रूपी घोड़ों को इधर-उधर भटकाता है। कभी योनि के आवेश में यही चंचल मन, मनुष्य को इस भ्रम में डालता है कि वह सर्वशक्तिमान है।
वो सब कुछ कर सकता है। वह यहां का राजा है जिसके आगे हर कोई झुक जाने पर विवश है। जिस तरह दीपक की बाती को दीपक तले छुपा अंधेरा दिखाई नहीं देता, उसी तरह जवानी को उसके पीछे छुपा हुआ बुढ़ापा, कमजोरी दिखाई नहीं देती। परंतु जब शरीर के दीपक में यौवन शक्ति का घी जल जल कर समाप्त होने लगता है और दीपक तले छुपा अंधेरा बढ़ने लगता है तो मनुष्य घबराकर चिल्लाने लगता है। मैं बीमार हूं। मैं मर रहा हूं मुझे बचाओ। यह रोने का नाटक भी मन ही करता है।
मनुष्य को ‘मै’ के घमंड की मदिरा पिलाकर मदहोश करने वाला पाखंडी केवल मन है।


मन से बड़ा बेहरूपी न कोई पल-पल रचता स्वांग निराले,
माया ममता में उलझा रहे वो पड़ जाए जो मन के पाले,
मन के बहकावे में ना आ, मन राह भुलाये भ्रम में डाले,
तू इस मन का दास न बन, इस मन को अपना दास बना ले।

मन के हाथों में मोह माया का जाल है जिसे वो मनुष्य की कामनाओं पर डालता रहता है और उसे अपने वश में करता
रहता है यह मन शरीर से सभी मुंह करता है अपनी खुशियों से भी मुंह करता है और अपने दुखों से भी खुशियों में खुशियों
से भरे हुए गीत गाता है तो दुख में दुख भरे गीत गुनगुनाता है अपने दुख में दूसरों को शामिल करके उसे खुशी होती है
किसी भी प्राणी को उसका मन जीवन के अंत तक अपनी जाल से निकलने नहीं देता रस्सी में बांधकर उससे उसी तरह से
नाच नचाता रहता है वह जीव को इतनी फुर्सत भी नहीं देता कि वह अपने अंतर में झांक कर अपनी आत्मा को पहचाने
और आत्मा के अंदर जिस परमात्मा का प्रकाश है उस परमात्मा का साक्षात्कार करें।

मन को वश में कैसे करें?

श्री कृष्ण कहते हैं, मन को वश में करने के लिए उस पर दो तलवारों से प्रहार करना पड़ता है :-

एक तलवार अभ्यास की है और दूसरी तलवार है वैराग्य की।

अभ्यास का अर्थ है निरंतर अभ्यास। मन को एक काम पर लगा दो वह वहां से भागेगा, उसे पकड़ कर लाओ, वो  फिर भागेगा, उसे फिर पकड़ो। ऐसा बार बार करना पड़ेगा। जैसे घोड़े का नवजात शिशु एक क्षण के लिए भी स्थिर नहीं रहता। क्षण क्षण में इधर-उधर फुदकता रहता है। 

उसी प्रकार मन भी क्षण क्षण में इधर-उधर भटकता रहता है। एक चंचल घोड़े की तरह मन भी  बड़ा चंचल होता है और ऐसे चंचल मन को काबू करना उतना ही कठिन है जैसे किसी मुहजोर घोड़े को काबू करना। ऐसे घोड़े को काबू करने के लिए सवार जितना जोर लगाता है, घोड़ा उतना ही विरोध करता है और बार-बार सवार को ही गिरा देता है। परंतु यदि सवार दृढ़ संकल्प हो तो अंत में वो  उस घोड़े पर सवार हो जाता है, बस फिर वही घोड़ा सवार के इशारे पर चलता है।

 इसी प्रकार मन को भी नियंत्रण की रस्सी में बांधकर बार-बार अपने रास्ते पर लाया जाता है तो अंत में वह अपने स्वामी का कहना मानना शुरू कर देता है। इसी को कहते हैं अभ्यास की तलवार चलाना।

जब अभ्यास की तलवार से ही मन सही रास्ते पर आ जाए तो फिर दूसरी वैराग्य की तलवार की क्या आवश्यकता है?

 कृष्ण कहते हैं – उसकी आवश्यकता इसलिए है, एक बार ठीक रास्ते पर आ जाने के बाद मन फिर से उलटे रास्ते पर ना चला जाए क्योंकि उल्टे रास्ते पर इंद्रियों के विषय उसे सदा ही आकर्षित करते रहेंगे। मिथ्या भोग, विलास और काम की तृष्णा उसे फिर अपनी ओर खींच सकती है। इसलिए मन को यह समझना जरूरी है कि वह सारे विषय भोग मिथ्या हैं, आसार हैं। योग माया के द्वारा उत्पन्न होने वाले मोह का भ्रम है। मन जब इस सत्य को समझ लेगा तो उसे विषयों से मोह नहीं रहेगा बल्कि उसे वैराग्य हो जाएगा और यही वैरागी की तलवार का काम है कि वो  विषयों को काट के मन को सन्यासी बना देती है।

Swami Vivekananda – “He should be able to say to his mind, “You are mine; I order you, do not see or hear anything”, and the mind will not see or hear anything — no form or sound will react on the mind“.

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